डिजिटल इंडिया के दौर में ई-एफआईआर की सुविधा इसलिए दी गई थी ताकि आम जनता को पुलिस थानों के चक्कर न काटने पड़ें, लेकिन मध्य प्रदेश पुलिस ने इसे अपनी पसंद-नापसंद का जरिया बना लिया। जबलपुर हाईकोर्ट ने भोपाल की डॉ. अंजलि मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस की इस कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामला इतना गंभीर हो गया कि कोर्ट ने अब बयान दर्ज करने के दौरान वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य कर दी है ताकि खाकी अपनी कलम से सच को दबा न सके।
क्या है पूरा मामला?
भोपाल की डॉ. अंजलि मिश्रा ने कुछ रसूखदार पदाधिकारियों के खिलाफ ई-एफआईआर दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत में कई आरोपियों के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज थे। लेकिन, जब पुलिस ने असल में केस दर्ज किया, तो खेल हो गया। पुलिस ने सिलेक्टिव अप्रोच अपनाते हुए केवल कुछ ही लोगों को आरोपी बनाया और बाकी के नाम गायब कर दिए। आरोप है कि ऐसा पुलिस ने केस को कमजोर करने और रसूखदारों को बचाने के लिए किया।
कोर्ट में पुलिस की खिंचाई
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली ने कोर्ट को बताया कि घटना के इतने समय बाद भी पुलिस ने धारा 161 CrPC (पुलिस द्वारा गवाहों की जांच) के तहत पीड़िता के बयान तक दर्ज नहीं किए हैं। जस्टिस बीपी शर्मा की एकलपीठ ने इसे पुलिस की घोर लापरवाही माना। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट तलब की है।
जब भी याचिकाकर्ता का बयान दर्ज किया जाए, वह वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ होना चाहिए, ताकि प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता बनी रहे। पुलिस अपनी मर्जी से आरोपियों को चुन नहीं सकती।
पारदर्शिता के लिए वीडियो का पहरा
कोर्ट ने इस मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि जब भी याचिकाकर्ता के बयान दर्ज किए जाएं, उसकी पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए। यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर शिकायतकर्ता आरोप लगाते हैं कि पुलिस ने उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। अब वीडियो साक्ष्य होने से पुलिस अपनी मर्जी से बयान नहीं बदल पाएगी।
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